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जो हौसला उसने बेटी में भरा, वही बना उसका सहारा: इस डॉटर्स डे पर क्लिनिक प्लस का संदेश — बेटी होती है माँ की मजबूती



  • ‘माँ की मजबूरी नहीं, बेटी होती है माँ की मजबूती’

आगरा 23 सितंबर 2026। यही विचार क्लिनिक प्लस की नई फिल्म के केंद्र में है। डॉटर्स डे से ठीक पहले क्लिनिक प्लस माँ और बेटी के उस रिश्ते को सलाम करता है, जिसमें दोनों चुपचाप एक-दूसरे की ताकत बन जाती हैं। भारतीय घरों में माँएँ हमेशा से अपनी बेटियों को अपने हक के लिए खड़े होना और अपनी आवाज़ पहचानना सिखाती आई हैं — जबकि उनसे खुद उम्मीद की जाती है कि वे चुप रहें, समझौते करें और अपने हिस्से की तकलीफ़ें खामोशी से सह लें। लेकिन जो बाकी दुनिया से छूट जाता है, बेटी वही देख लेती है। वह अपनी माँ के अनकहे त्याग को सहज ही पढ़ लेती है और मुश्किल घड़ी में उसके संयम को आत्मसात कर लेती है। यह फिल्म आज की बेटी को सिर्फ़ पाली-पोसी जाने वाली संतान के रूप में नहीं, बल्कि अपनी माँ के सबसे बड़े सहारे के रूप में सामने रखती है — एक ऐसी हमराज़, जिसकी संवेदनशीलता, खामोश मौजूदगी और भरोसा माँ को आगे बढ़ने और खुद को चुनने का हौसला देता है।
    फिल्म की कहानी एक पुस्तक विमोचन समारोह के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जहाँ एक लेखिका अपने ही जीवन से निकली कविताओं का संग्रह लेकर सामने आती है। जब उससे पूछा जाता है कि उसके लेखन की प्रेरणा कौन है, तो माँ बस अपनी बेटी की ओर इशारा कर देती है। यहीं से कहानी बचपन के एक पल में लौटती है, जब नन्ही बच्ची दो चोटियों की जगह एक ही चोटी बनवाने की ज़िद करती है — और यहीं से वह बुनियादी रूपक गढ़ा जाता है कि असली मजबूती भीतर से आती है। जैसे-जैसे साल बीतते हैं, दोनों का रिश्ता खामोश निगरानी से बढ़कर सक्रिय साथ में बदल जाता है।
    जब माँ के आसपास हर कोई उसे एक मुश्किल शादी में समझौता करने और सह लेने की सलाह देता है, तब बेटी ही है जो उसे यह हालात नए सिरे से देखने में मदद करती है — माँ जो कहती नहीं, बेटी उसे भी चुपचाप पढ़ लेती है। कभी-कभी मजबूती का मतलब खुद को चुनना भी होता है। आखिरकार यही साझा हिम्मत माँ को अपनी शर्तों पर जिंदगी दोबारा गढ़ने का हौसला देती है, और कहानी घूमकर वहीं पुस्तक विमोचन पर लौट आती है, जहाँ वह अपनी बेटी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती है।
    हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) में ब्यूटी एंड वेलबीइंग की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हरमन ढिल्लों ने कहा, “एक माँ अपनी बेटी को मजबूत, संवेदनशील और आत्मनिर्भर बनाती है, और एक दिन वही बेटी माँ का सबसे बड़ा सहारा बन जाती है। यह फिल्म उसी खूबसूरत बदलाव का उत्सव है, जहाँ माँ का दिया हुआ आत्मविश्वास लौटकर उसी का संबल और हौसला बन जाता है। हम यह कहानी देश की उन 1.3 करोड़ सिंगल मदर्स को समर्पित करते हैं, जिनकी जीवटता न सिर्फ़ उनकी बेटियों का भविष्य गढ़ती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि बेटी होती है माँ की मजबूती।”
    यह अभियान मजबूत बेटियाँ गढ़ने वाली माँओं के साथ क्लिनिक प्लस के लंबे रिश्ते को आगे बढ़ाता है। इस डॉटर्स डे पर क्लिनिक प्लस माँ-बेटी के रिश्ते में आए एक गहरे बदलाव को सामने रखता है: जिन हाथों ने कभी बेटी को मजबूत बनना सिखाया था, आज वही हाथ बेटी ने थाम रखे हैं। कभी-कभी माँ अपनी बेटी को जो ताकत देती है, वह घूमकर उसी के पास लौट आती है।

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