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नवजात शिशुओं में कॉनजेनिटल हार्ट डिजीज, संकेत पहचानें और समय पर उपचार सुनिश्चित करें



मथुरा 20 नवम्बर 2025। कॉनजेनिटल हार्ट डिजीज  (का कुल प्रसार लगभग 10 से 12 प्रति 1000 नवजात शिशुओं में देखा जाता है, यानी लगभग 1 प्रतिशत बच्चों में। यह संख्या वास्तव में इससे अधिक भी हो सकती है, क्योंकि गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में कुछ ऐसे भ्रूण जिनमें गंभीर हृदय विकार या क्रोमोसोमल असामान्यताएं होती हैं, वे जीवित नहीं रह पाते और निदान से पहले ही मृत्यु हो जाती है। CHD के ये आंकड़े हल्के से लेकर अत्यंत गंभीर हृदय रोगों तक का पूरा दायरा दर्शाते हैं — कुछ रोग ऐसे होते हैं जो जीवनकाल पर कोई प्रभाव नहीं डालते, जबकि कुछ इतने गंभीर होते हैं कि जन्म के तुरंत बाद उपचार आवश्यक हो जाता है।
    मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी विभाग के सीनियर कंसल्टेंट, डॉ. अंकित गर्ग ने बताया कि “अधिकांश मामलों में, यह तय करना कठिन होता है कि शिशु में CHD क्यों विकसित हुआ, लेकिन कुछ स्थितियाँ “हाई रिस्क” मानी जाती हैं जिनमें इस रोग की संभावना अधिक रहती है। यदि माता या पिता (विशेषकर माँ) स्वयं CHD से पीड़ित हों या उसका उपचार करा चुके हों, तो बच्चे में इस रोग का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, यदि गर्भवती महिला ऐसी दवाइयों का सेवन कर रही हो जो CHD से जुड़ी हों, शराब का सेवन करती हो, या गर्भावस्था के शुरुआती चरण में एक्स-रे विकिरण के संपर्क में आई हो, तो जोखिम और बढ़ जाता है। भ्रूण में हृदय के बाहर किसी अन्य असामान्यता का पाया जाना या कुछ क्रोमोसोमल विकारों की उपस्थिति भी CHD से संबंधित होती है। साथ ही, यदि पहले किसी भाई या बहन को CHD रहा हो, तो यह खतरा और अधिक हो जाता है।“
    हृदय में छेद (हार्ट होल) या अन्य जन्मजात हृदय विकारों के लक्षण बहुत भिन्न हो सकते हैं। कुछ मामलों में यह बिल्कुल लक्षणहीन होते हैं और सामान्य जांच के दौरान ही सामने आते हैं, जबकि कुछ इतने गंभीर हो सकते हैं कि गर्भावस्था के दौरान ही जीवन को खतरा पैदा कर देते हैं। इन लक्षणों के प्रकट होने का समय भी अलग-अलग हो सकता है – भ्रूण अवस्था से लेकर वयस्कता तक। सामान्यतः, अधिकांश हृदय रोग जन्म के तुरंत बाद या जीवन के पहले दो महीनों में पहचान लिए जाते हैं। विशेषकर गंभीर CHD के मामलों का निदान नवजात के अस्पताल से डिस्चार्ज होने से पहले ही कर लेना चाहिए।
    डॉ. अंकित ने आगे बताया कि “कुछ चेतावनी संकेत ऐसे हैं जिनसे माता-पिता और शिशु रोग विशेषज्ञ दोनों को सतर्क रहना चाहिए। यदि बच्चा नीला दिखाई दे (ब्लू डिसकलरेशन), तो यह ऑक्सीजन की कमी का संकेत हो सकता है और तत्काल जांच आवश्यक है। इसके अलावा, बिना किसी स्पष्ट कारण के अत्यधिक रोना, दूध पीते समय अत्यधिक पसीना आना या बार-बार रुक-रुक कर दूध पीना, अपेक्षित वजन न बढ़ना, तेज या कठिन सांस लेना, तथा बार-बार श्वसन संक्रमण होना — ये सभी संकेत हृदय रोग की ओर इशारा कर सकते हैं। वर्तमान समय में CHD के निदान के लिए सबसे महत्वपूर्ण और पहला उपकरण है ईकोकार्डियोग्राफी। इसके माध्यम से लगभग सभी प्रकार के जन्मजात हृदय रोगों का सटीक निदान किया जा सकता है, जिससे आगे के उपचार की योजना बनाना भी आसान हो जाता है।“
    आजकल गर्भावस्था के 16वें सप्ताह से ही फीटल ईकोकार्डियोग्राफी के जरिए भ्रूण में भी हृदय रोग का पता लगाया जा सकता है। इससे माता-पिता को बच्चे के जन्म से पहले ही रोग की प्रकृति समझने और उपचार की दिशा तय करने में मदद मिलती है।
    समय पर परामर्श और शीघ्र निदान इस रोग के प्रबंधन में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। शुरुआती पहचान से न केवल बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसके भविष्य के जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बनाई जा सकती है।

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