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हर बढ़ते किलो के साथ बढ़ रहा है बीमारी का खतरा



कानपुर 19 नवंबर 2025।  पिछले दो दशकों में स्वास्थ्य जगत में कुछ चुनौतियाँ इतनी तेज़ी से नहीं बढ़ीं जितनी मोटापा बढ़ा है। जो कभी कभी होने वाला मामला था, अब सबसे आम हेल्थ कंडीशन्स में से एक बन चुका है। बच्चे, किशोर, कामकाजी लोग या बुजुर्ग — कोई भी इससे अछूता नहीं है। मोटापा लिंग, उम्र या क्षेत्र नहीं देखता — यह सबको प्रभावित करता है।
    कई लोग थक चुके हैं — न सिर्फ़ शरीर से बल्कि मन से भी। कोशिशें करते हैं, फिर भी वज़न नहीं घटता और समाज के ताने नहीं रुकते। मोटापे का असली बोझ सिर्फ़ शरीर का नहीं होता, बल्कि उस जजमेंट, शर्म और निराशा का भी होता है जो इसके साथ चलती है।
    मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ लैप्रोस्कोपिक, रोबोटिक और बैरिएट्रिक सर्जरी एवं एलाइड सर्जिकल स्पेशलिटीज के ग्रुप चेयरमैन डॉ. प्रदीप चौबे ने बताया कि “सच्चाई यह है कि मोटापा केवल ‘इच्छाशक्ति’ की कमी नहीं, बल्कि एक क्रॉनिक और मल्टीफैक्टोरियल डिज़ीज़ है, जिस पर जेनेटिक्स, हार्मोन, लाइफस्टाइल और एनवायरनमेंट — सबका असर पड़ता है। शहरी जीवनशैली ने जैसे इस समस्या को जन्म देने के सारे हालात तैयार कर दिए हैं — लंबे काम के घंटे, जंक और प्रोसेस्ड फूड, बैठे-बैठे दिन गुज़ारना, और स्ट्रेस का बढ़ता स्तर। ऊपर से नींद की कमी और हाई-कैलोरी स्नैक्स की आसान उपलब्धता, ये सब मिलकर एक एपिडेमिक बना रहे हैं। और भी चिंताजनक है बचपन में बढ़ता मोटापा। छोटे बच्चों की खाने-पीने और रहने की आदतें आगे चलकर डायबिटीज़, हाइपरटेंशन और हार्ट डिज़ीज़ जैसी बीमारियों की राह खोल देती हैं।“
    फिर भी उम्मीद है — क्योंकि मोटापा, कई अन्य क्रॉनिक डिज़ीज़ की तरह, पूरी तरह से रिवर्स किया जा सकता है। जब लोग वज़न घटाने को नैतिक संघर्ष नहीं बल्कि मेडिकल जर्नी की तरह लेते हैं, तो नतीजे शानदार मिलते हैं। संतुलित डाइट, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी, पर्याप्त नींद और स्ट्रेस कंट्रोल इसकी बुनियाद हैं। वहीं जिन मरीजों को गंभीर मोटापा या उससे जुड़ी बीमारियाँ हैं, उनके लिए बैरिएट्रिक और मेटाबॉलिक सर्जरी जीवन बदल देने वाली साबित हो सकती है — यह डायबिटीज़ को कंट्रोल करती है और दिल को स्वस्थ बनाती है।
    डॉ. प्रदीप ने आगे बताया कि “पर इलाज ही काफी नहीं। ज़रूरत है जागरूकता और करुणा की। समाज को स्टिग्मा से समझ की ओर बढ़ना होगा। परिवारों को ताने नहीं, सपोर्ट देना होगा। कार्यस्थलों पर वेलनेस को प्रोत्साहित करना होगा, और छोटे बदलावों को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। मोटापे का मानसिक स्वास्थ्य से भी गहरा रिश्ता है। स्ट्रेस, डिप्रेशन और आत्मविश्वास की कमी कई बार लोगों को ओवरईटिंग की ओर धकेलती है। इस चक्र को तोड़ने में काउंसलिंग और कम्युनिटी सपोर्ट अहम भूमिका निभाते हैं। इस एंटी-ओबेसिटी डे पर ज़रूरत है कि डॉक्टर, नीति निर्माता और आम नागरिक — सब मिलकर मोटापे को एक कॉस्मेटिक इश्यू नहीं बल्कि एक क्रॉनिक हेल्थ कंडीशन मानें, जिसे समय पर पहचान, सहानुभूति और शिक्षा से बदला जा सकता है। मोटापे से लड़ाई का मकसद सिर्फ़ वज़न घटाना नहीं, बल्कि जीवन में ऊर्जा, आत्मविश्वास और क्वालिटी वापस लाना है। हर मरीज जो अपनी सेहत वापस पाता है, यह साबित करता है कि सही मार्गदर्शन और सपोर्ट से यह संकट अजेय नहीं है — इसे बदला जा सकता है।“
    अगर आपके या आपके किसी अपने के जीवन में मोटापा समस्या बन चुका है, तो किसी मल्टीडिसिप्लिनरी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस से संपर्क करें — जहाँ मेडिकल मूल्यांकन, न्यूट्रिशनल गाइडेंस, साइकोलॉजिकल सपोर्ट और ज़रूरत पड़ने पर एडवांस्ड सर्जिकल इंटरवेंशन्स — सब एक ही जगह उपलब्ध हों।

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